KONA RUSHWAIYION KA
Monday, February 17, 2014
शायद मुक़द्दस होंठ जवाब ही दे दे ...
रोज़ उसे एक ख़त लिखता था,
और जब सारी बातें ,सारी नज़मे कह लेता था,
मैं ख़त में अपनी दोनों आँखें रख देता था,
वो जब पढ़ती थी उस ख़त को,
मेरी आँखें उस वक़्त सुनती रहती थी,
कि शायद मुक़द्दस
होंठ जवाब ही दे दे !
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